समाज की भलाई तभी संभव जब युवा पीढ़ी शिक्षित हो, उद्यमी बने और अपने स्वाभिमान से समझौता न करे-पचौरी

सागर। पूर्व जिला शहर कांग्रेस अध्यक्ष राजकुमार पचौरी ने भगवान परशुराम के प्रकट उत्सव पर पहलवान बाबा मंदिर पहुंचकर हवन पूजन किया और विश्व शांति की कामना की। पचौरी ने अपने संदेश में कहा कि भगवान परशुराम केवल ब्राह्मण कुल में जन्मे एक योद्धा मात्र नहीं थे, बल्कि वे अन्याय के विरुद्ध ब्रह्मांड के प्रथम उद्घोष थे। आज के आधुनिक युग में, जब समाज विभिन्न चुनौतियों से जूझ रहा है, उनके जीवन का संदेश ब्राह्मण समाज और संपूर्ण मानवता के लिए एक मशाल के समान है।

पचोरी का मानना है कि ‘ब्राह्मण’ केवल जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और संस्कारों से परिभाषित होता है। भगवान परशुराम ने सिखाया कि ब्राह्मण का धर्म केवल शास्त्र पढ़ना नहीं, बल्कि शास्त्रों की मर्यादा की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना भी है। समाज की भलाई तभी संभव है जब युवा पीढ़ी शिक्षित हो, उद्यमी बने और अपने स्वाभिमान से समझौता न करे। भगवान परशुराम का संघर्ष किसी जाति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि अहंकारी और अत्याचारी सत्ता के खिलाफ था। परशुराम जी ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी न्याय दिलाया। सच्चा ब्राह्मण वही है जो सभी जातियों को प्रेम और सम्मान की दृष्टि से देखे। पचौरी के अनुसार, समाज को एकजुट करने के लिए हमें भेदभाव की दीवारें ढहाकर एक ऐसे भारत का निर्माण करना होगा जहाँ योग्यता और मानवता ही श्रेष्ठता का पैमाना हो।अन्याय के विरुद्ध ‘परशु’ धारण करना। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता मद में चूर होकर किसी ने निर्दोषों पर अत्याचार किया, तब-तब परशुराम के वंशजों ने अपनी बौद्धिक और शारीरिक शक्ति से उसे चुनौती दी।

“अन्याय सहना उतना ही बड़ा पाप है जितना अन्याय करना। यदि समाज के किसी भी वर्ग के साथ अन्याय होता है, तो ब्राह्मण समाज को अग्रणी भूमिका निभाते हुए न्याय की आवाज बुलंद करनी चाहिए।

पचौरी ने युवाओं से आवाह्न किया कि आर्थिक स्वावलंबन समाज की असली शक्ति है। अपने पैरों पर खड़े हों और दूसरों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करें। अपनी जड़ों और संस्कृति को न भूलें। परशुराम जी की तपस्या हमें।आत्म-नियंत्रण सिखाती है। बिखराव हमें कमजोर करता है। एक सशक्त ब्राह्मण समाज ही एक सशक्त और न्यायपूर्ण राष्ट्र की नींव रख सकता है। भगवान परशुराम का जीवन हमें सिखाता है कि दया केवल वीरों को शोभा देती है। हम शांत हैं क्योंकि हम ‘शस्त्र’ और ‘शास्त्र’ दोनों का सम्मान करना जानते है।

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